Sunday, November 28, 2010

दिल ही दिल क्यों कोई गवाह दूंड़े
काफी है ग़र आईने में हिसाब रखे
अज़ल

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क्यों फिर दिमाग उलझे तारों के जाल में
येही मंजिल के उसके नक़्शे पा, पा न पाउँगा
दिख कर भी न दिखे जुज्व में कुल मुझे
ये ख्वाहिशे एक दागे में पिरो न पाउँगा
अज़ल

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Sunday, June 6, 2010

नशा उतर ही जाता है
प्यार रोज़मर्रा में खो ही जाता है
एक याद रह जाती है , रंगीनियों की
खूब सूरत पल चला ही जाता है
खेंचेतें है हम बहुत अपने आप को
खुद से अपना दामन छूट ही जाता है
‘होनी ’ से यारी अक्लमंद ज़िन्दगी है
जो होना है वो आखिर हो ही जाता है
रोज़े अज़ल से तै है मंजिल , खेंचेती है
जिस राह का जो है , उस पर आ ही जाता है
न भूलें है किसी को यूँ भूल कर भी
रह रह कर ख़याल उनका आ ही जाता है

अज़ल .





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Sunday, January 31, 2010

तुझपे टिके नज़र तो सब गवारां है मुझे
तुझसे नज़र हटे तो सांस बोझा है मुझे

पीते नहीं ज़ाहिद रखते हो ख़याल रिंद पर
उसके दीदार को सूरते वुज़ू, बादा है मुझे

अज़ल
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