अनजान राहों से रास्ता घर का गुज़रता है
गैर्रों से हो कर दिल अपनों को पहुँचता है
क्या दिल की कहूँ ये तो वो शय है
मुझे जिंदा रख तेरे लिए धड़कता है
क्या कोई पहचानेगा दिमाग से किसी को
फ़क़त मौजूदगी से दोस्त पता चलता है
एक अदा में तुम ख़त्म कर डालो मुझे
इससे अपनी कुर्बत का पता चलता है
गर गहराई तय करे है कीमत मोती की
बाज़ार में फिर क्या बिका करता है
कुछ भी गर खींच ले तवज्जो जहाँ में
वहीं से दिल एक दास्ताँ शरू करता है
अज़ल

गैर्रों से हो कर दिल अपनों को पहुँचता है
क्या दिल की कहूँ ये तो वो शय है
मुझे जिंदा रख तेरे लिए धड़कता है
क्या कोई पहचानेगा दिमाग से किसी को
फ़क़त मौजूदगी से दोस्त पता चलता है
एक अदा में तुम ख़त्म कर डालो मुझे
इससे अपनी कुर्बत का पता चलता है
गर गहराई तय करे है कीमत मोती की
बाज़ार में फिर क्या बिका करता है
कुछ भी गर खींच ले तवज्जो जहाँ में
वहीं से दिल एक दास्ताँ शरू करता है

अज़ल