Azal
Thursday, January 24, 2008
रास्ता ही जब रहबर है
रहबर की तलाश क्यों है
मौजूद है सारी हाजतें
फिर ये कशमकश क्यों है
हो चुके जब उनके हम
इंतज़ार ए इशारा क्यों है
दिमाग में जब है इतना कुछ
दिल यूं मेरा बेज़ुबान क्यों है
Azal
तालिब ए इल्म रहा ता उम्र तेरी कायनात के आगे
ठहरा हुआ मुसाफिर रहा इन राहों के आगे
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