चलता हूँ थोडी दूर हर एक तेज़रो के साथ पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को में
Ghalib
2008 मुबारक हो साल में क्या नया है वक़्त मुझे पुरानी सादगी से देखे है जब देखूं इस जहाँ के चलन को , अफ़सोस किसी को भी ये, कब नयी निगाह से देखे है ? नए साल की बधांइयां लीजिये , यूं मौका है आज फिर शाम रंगीन करेंगे और आज पागल पन पे अक्ल वाले फिकरे कम कसेंगे अज़ल
Sunday, December 30, 2007
Expression is the sole purpose of life, supression is the life which we dread but still keep on living unconciously!